सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय - Sumitranandan Pant Biography In Hindi

सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन परिचय

जीवन परिचय -- सुकुमार भावनाओं के कवि और प्रकृति के चतुर-चितेरे श्री सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म 20 मई, सन् 1900 ई॰ को प्रकृति की सुरम्य गोद में अल्मोड़ा के निकट कौसानी नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पं॰ गंगादत्त पन्त था। इनके जन्म के छ: घण्टे के बाद ही इनकी माता का देहान्त हो गया था; अत: इनका लालन-पालन पिता और दादी के वात्सल्य की छाया में हुआ। पन्त जी ने अपनी शिक्षा का प्रारम्भिक चरण अल्मोड़ा में पूरा किया। यहीं पर इन्होंने अपना नाम गुसाईंदत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन रखा। इसके बाद वाराणसी के जयनारायण हाईस्कूल से स्कूल-लीविंग की परीक्षा उत्तीर्ण की और जुलाई, 1919 ई॰ में इलाहाबाद आये और म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया। सन् 1921 ई॰ में महात्मा गांधी के आह्यान पर असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर इन्होंने बी॰ ए॰ की परीक्षा दिये बिना ही कॉलेज त्याग दिया था। इन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला और हिन्दी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था। प्रकृति की गोद में पलने के कारण इन्होंने अपनी सुकुमार भावना को प्रकृति के चित्रण में व्यक्त किया। इन्होंने प्रगतिशील विचारों की पत्रिका 'रूपाभा' का प्रकाशन किया। सन् 1942 ई॰ में 'भारत छोड़ो आन्दोलन' से प्रेरित होकर 'लोकायन' नामक सांस्कृतिक पीठ की स्थापना की और भारत-भ्रमण हेतु निकल पड़े। सन् 1950 ई॰ में ये 'ऑल इण्डिया रेडियो' के परामर्शदाता पद पर नियुक्त हुए और सन् 1976 ई॰ में भारत सरकार ने इनकी साहित्य-सेवाओं को 'पद्मभूषण' की उपाधि से सम्मानित किया। इनकी कृति 'चिदम्बरा' पर इनको 'भारतीय ज्ञानपीठ' पुरस्कार मिला। 28 दिसम्बर, सन् 1977 ई॰ को इस महान् साहित्यकार ने भौतिक संसार से सदैव के लिए विदा ले ली और चिरनिद्रा में लीन हो गये।
                                 रचनाएँ -- 

               पन्त जी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) वीणा, (2) ग्रन्थि, (3) पल्लव (इसमें वसन्तश्री, परिवर्तन, मौन-निमन्त्रण, बादल आदि श्रेष्ठ कविताएँ संकलित हैं।), (4) गुंजन (नौका-विहार इस संकलन की श्रेष्ठ कविता है।), (5) युगान्त, (6) युगवाणी, (7) ग्राम्या, (8) लोकायतन

पन्त जी की अन्य रचनाएँ हैं- (1) पल्लविनी, (2) अतिमा, (3) युगपथ, (4) ऋता, (5) स्वर्णकिरण, (6) चिदम्बरा, (7) उत्तरा, (8) कला और बूढ़ा चाँद, (9) शिल्पी, (10) स्वर्णधूलि आदि।

साहित्य में स्थान 
सुन्दर, सुकुमार भावों के चतुर-चितेरे पन्त ने खड़ी बोली को ब्रजभाषा जैसा माधुर्य एवं सरसता प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। पन्त जी गम्भीर विचारक, उत्कृष्ट कवि और मानवता के सहज आस्थावान् कुशल शिल्पी हैं, जिन्होंने नवीन सृष्टि के अभ्युदय की कल्पना की है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि "पन्त जी हिन्दी कविता के श्रृंगार हैं, जिन्हें पाकर माँ-भारती कृतार्थ हुई।"

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