पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन परिचय - Padumlal Punnalal Bakshi Biography In Hindi
जीवन परिचय- पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्विवेदी युग के सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे। उनकी प्रसिद्धि का प्रमुख आधार आलोचना और निबन्ध-लेखन था। विशेषत: ललित-निबन्धों के क्षेत्र में उन्हें अपार यश प्राप्त हुआ। एक गम्भीर विचारक, शिष्ट हास्य-व्यंग्यकार और कुशल आलोचक के रूप में बख्शीजी सदैव याद किए जाते रहेंगे। डॉ० राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी के अनुसार, "बख्शीजी सरल और सात्त्विक विचारों के साहित्यकार हैं तथा उनकी साहित्य-साधना विविधरूपिणी भी है। वह खड़ीबोली के भावुक कवि, सुयोग्य सम्पादक, अध्ययनशील समीक्षक, प्रौढ़ निबन्धकार, समर्थ अनुवादक और एक कुशल कहानीकार के रूप में हमारे सामने आते हैं।"
जीवन परिचय- बख्शीजी का जन्म सन् 1894 ई० में छत्तीसगढ़ क्षेत्र के अन्तर्गत खैरागढ़ नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम उमराव और पितामह का नाम पुन्नालाल बख्शी था। इनके पितामह और पिता दोनों ही साहित्यानुरागी थे और काव्य-रचना भी करते थे। इनकी माता के हृदय में भी साहित्य के लिए बहुत अनुराग था। इस प्रकार बख्शीजी का जन्म एक साहित्यिक परिवार में हुआ था और ऐसे परिवेश में ही उनका पालन-पोषण तथा शिक्षा-दीक्षा भी हुई थी।
बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात बख्शीजी जीवन-क्षेत्र में उतरे। जीवन-क्षेत्र में इन्होंने साहित्य-सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। ये कविताऍं और कहानियाॅं लिखने लगे। प्रारम्भ में इनकी कहानियाॅं और कविताऍं 'हितकारिणी' में प्रकाशित हुआ करती थी; इसके पश्चात् दूसरे पत्रों में भी प्रकाशित होने लगीं। द्विवेदीजी के सम्पर्क में आने पर इनकी रचनाऍं 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित होने लगीं। द्विवेदीजी बख्शीजी की रचनाओं और योग्यताओं से अत्यधिक प्रभावित हुए। परिणामस्वरूप उनके हृदय पर बख्शीजी का अधिकार-सा हो गया। इसी अधिकार का परिणाम था कि द्विवेदीजी जब 'सरस्वती' पत्रिका का सम्पादन-कार्य छोड़ने लगे, तब उन्होंने बख्शीजी के ही हाथों में उसकी बागडोर सौंपी। बख्शीजी ने कई वर्षों तक 'सरस्वती' का सम्पादन बड़ी कुशलता के साथ किया। 'सरस्वती' का सम्पादन-कार्य छोड़ने के पश्चात् वे खैरागढ़ चले गए और वहाॅं शिक्षण-कार्य किया।
अनेक वर्षों तक शिक्षण-कार्य करने के पश्चात् इन्होंने अवकाश ग्रहण कर लिया। सन् 1971 ई० में 77 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्विवेदी युग के सुप्रसिद्ध रचनाकार थे। महावीरप्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आकर बख्शीजी को अपनी साहित्यिक प्रतिभा निखारने का पर्याप्त अवसर प्राप्त हुआ। साहित्य की कई विधाओं में अनेक प्रभावपूर्ण रचनाऍं लिखकर इन्होंने एक यशस्वी साहित्यकार के रूप में अपूर्व ख्याति अर्जित की। निबन्ध के क्षेत्र में बख्शीजी ने उच्चकोटि के विचारात्मक, आलोचनात्मक व समीक्षात्मक निबन्ध लिखे। भारतीय एवं पाश्चात्य विचारधारा की तुलनात्मक समीक्षा पर आधारित बख्शीजी के समीक्षात्मक निबन्धों का विशिष्ट महत्त्व है। इन्होंने छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होनेवाले कई महत्त्वपूर्ण निबन्धों की रचना भी की। बख्शीजी के द्वारा लिखी गई भावनाप्रधान कहानियाॅं अत्यन्त मर्मस्पर्शी हैं। 'सरस्वती' जैसी प्रख्यात पत्रिका का कुशल सम्पादन करते हुए इन्होंने एक सफल सम्पादक के रूप में अपनी छवि बनाई। ये एक सफल अनुवादक भी थे। अंग्रेजी एवं बाॅंग्ला भाषा के कई नाटकों एवं कहानियों का इन्होंने भावपूर्ण अनुवाद किया।
बख्शीजी मननशील विद्वान् थे। इन्होंने साहित्य, कला, नाटक, काव्य और आलोचना आदि से सम्बध्द विषयों पर रचनाऍं कीं। इनके ग्रन्थों में मौलिक और गम्भीर ज्ञान की झलक मिलती है।
इनकी प्रमुख कृतियाॅं इस प्रकार हैं-
- काव्य- शतदल, अश्रुदल।
- कहानी-संग्रह- अंजलि।
- आलोचना- विश्व-साहित्य, हिन्दी-साहित्य-विमर्श, हिन्दी- उपन्यास- साहित्य, हिन्दी-कहानी-साहित्य।
- निबन्ध- संग्रह-पंच-पात्र, प्रबन्ध-पारिजात, कुछ यात्री, कुछ बिखरे पन्ने और पद्मवन।
- अनूदित- प्रायश्चित, उन्मुक्ति का निबन्ध, तीर्थस्थल।
'झलमला' बख्शीजी की अपने समय की बहुत प्रसिद्ध कहानी (लघुकथा) थी। इन्होंने बाल-साहित्य से सम्बन्धित अनेक पुस्तकें भी लिखी हैं।
बख्शीजी की भाषा का अपना एक आदर्श है। उनका मत था कि भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें सभी प्रकार के विषयों का विवेचन किया जा सके। इन्होंने अपनी भाषा में इसी आदर्श की स्थापना की है। इनकी भाषा में जटिलता और रूखापन नहीं है। बख्शीजी की भाषा में यत्र-तत्र उर्दू के शब्द भी मिलते हैं; जैसे-जोर, दिमाग, सुबह इत्यादि। इसी प्रकार अंग्रेजी के व्यावहारिक शब्दों का प्रयोग भी उन्होंने कहीं-कहीं किया है; जैसे- डॉक्टर, सर्जरी इत्यादि। इन शब्दों के प्रयोग से भाषा की सरसता और प्रवाहमयता में वृद्धि ही हुई है।
बख्शीजी की शैली के निम्नलिखित तीन रूप हैं-
- भावात्मक शैली- इस शैली के दर्शन इनके उन निबन्धों में मिलते हैं, जो कथात्मक हैं। यह शैली सरल और सरस है। इसमें छोटे-छोटे वाक्य हैं, जिनकी सहायता से भावों की अभिव्यंजना बड़ी कुशलता के साथ हुई है। इस शैली में गतिशीलता, सजीवता और चित्रात्मकता भी है।
- व्याख्यात्मक शैली- यह शैली इनके आलोचनात्मक निबन्धों में मिलती है। गम्भीर विषयों का प्रतिपादन इस शैली में किया गया है, इसलिए यह शैली अधिक गम्भीर है। विषय की गम्भीरता के कारण कहीं-कहीं यह शैली क्लिष्ट भी हो गई है।
- विचारात्मक शैली- यह शैली इनके बहुत कम निबन्धों में मिलती है। इस शैली में छोटे-छोटे वाक्य हैं, जो श्रृंखलाबद्ध और भावपूर्ण हैं।
बख्शीजी एक अध्ययनशील साहित्यकार, सफल आलोचक, श्रेष्ठ कहानीकार और सुप्रसिद्ध निबन्धकार थे। इन्होंने कला, काव्य, नाटक, कहानी और उपन्यास आदि विधाओं का गम्भीर अध्ययन किया तथा इन विषयों पर महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना भी की। साहित्य-साधना के मार्ग पर ये मौन तपस्वी की भाॅंति निरन्तर कार्यरत रहे। इसमें सन्देह नहीं कि अपनी विकट परिस्थितियों में भी इन्होंने जिस दृढ़ता और कर्मठता का परिचय दिया, वह एक प्रेरणास्पद उदाहरण है।

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